खनन और खनिज उद्योगों में पर्यावरणीय स्थिरता विषय पर विशेषज्ञों का मंथन पर्यावरणीय स्थिरता मानव समाज के निरन्तर अस्तित्व, समृद्धि और स्वास्थ्य के लिए मूलभूत शर्त है। हमारी न्यू जनरेशन को स्पीड और टेक्नोलॉजी पर ध्यान केंद्रित करना होगा ताकि भविष्य को सुनहरा बनाया जा सके। उक्त विचार मुख्य अतिथि श्री एमपी सिंह, प्रधान मुख्य अभियंता, केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण विद्युत मंत्रालय भारत सरकार, नई दिल्ली ने व्यक्त किए श्री सिंह भूपाल नोबल्स स्नातकोत्तर महाविद्यालय में भूविज्ञान विभाग द्वारा "खनन और खनिज उद्योगों में पर्यावरणीय स्थिरता" विषय पर आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय कॉन्फ्रेंस के समापन पर बोल रहे थे। दो दिवसीय राष्ट्रीय कान्फ्रेंस का भव्य समापन सम्मानित अतिथि प्रो विनोद अग्रवाल सदस्य, भारत सरकार नई दिल्ली स्थित MOEFCC की विशेषज्ञ मूल्यांकन समिति, (सि एण्ड टीपी) अपने उद्बोधन में कहा कि पर्यावरण स्थिरता सरकार और समाज दोनों की जिम्मेदारी है। वर्तमान में खनन उद्योग विभिन्न प्रावधानों एवं कानूनों के तहत कार्य कर रहा है ताकि पर्यावरण को सुरक्षित रखा जा सके। आयोजन सचिव डॉ. हेमंत सेन न...
कबीर दास जी के दोहे
कबीरदास जी आज हमारे बीच में नहीं हैं परन्तु उनके दोहों में कई गूढ़ बाते हैं जो हमें जिन्दगी की सच्चाई से रूबरू कराती हैं। इस लेख में कबीरदास जी के उन्हीं दोहों को दिया गया है।
- कबीर नौबत आपणी, दिन दस लेहु बजाइ।
- ए पुर पाटन, ए गली, बहुरि न देखै आइ॥
- जो तूं ब्राह्मण, ब्राह्मणी का जाया।
- आन बाट काहे नहीं आया॥
- पाथर पूजे हरी मिले, तो मै पूजू पहाड़।
- घर की चक्की कोई न पूजे, जाको पीस खाए संसार॥
- माटी का एक नाग बनाके, पुजे लोग लुगाया।
- जिंदा नाग जब घर मे निकले, ले लाठी धमकाया॥
- लाडू लावन लापसी, पूजा चढ़े अपार।
- पूजी पुजारी ले गया, मूरत के मुह छार॥
- उजला कपड़ा पहरि करि, पान सुपारी खाहिं।
- एकै हरि के नाव बिन, बाँधे जमपुरि जाहिं॥
- ऐसी वाणी बोलिए मन का आप खोये।
- औरन को शीतल करे, आपहुं शीतल होए॥
- ऐसी वाणी बोलिए मन का आप खोये।
- औरन को शीतल करे, आपहुं शीतल होए॥
- कबीर सुता क्या करे, जागी न जपे मुरारी।
- एक दिन तू भी सोवेगा, लम्बे पाँव पसारी॥
- कहा कियौ हम आइ करि, कहा कहैंगे जाइ।
- इत के भये न उत के, चाले मूल गंवाइ॥
- काल करे सो आज कर, आज करे सो अब।
- पल में परलय होएगी, बहुरि करेगा कब॥
- गुरु गोविंद दोउ खड़े, काके लागूं पाय।
- बलिहारी गुरु आपने, गोविंद दियो मिलाय॥
- चलती चक्की देख के, दिया कबीरा रोये।
- दो पाटन के बीच में, साबुत बचा न कोए॥
- जग में बैरी कोई नहीं, जो मन शीतल होए।
- यह आपा तो डाल दे, दया करे सब कोए॥
- जल में बसे कमोदनी, चंदा बसे आकाश।
- जो है जा को भावना सो ताहि के पास॥
- जहाँ दया तहा धर्म है, जहाँ लोभ वहां पाप।
- जहाँ क्रोध तहा काल है, जहाँ क्षमा वहां आप॥
- जाती न पूछो साधू की, पूछ लीजिये ज्ञान।
- मोल करो तलवार का, पड़ा रहने दो म्यान॥
- जिन घर साधू न पुजिये, घर की सेवा नाही।
- ते घर मरघट जानिए, भुत बसे तिन माही॥
- जिनके नौबति बाजती, मैंगल बंधते बारि।
- एकै हरि के नाव बिन, गए जनम सब हारि॥
- जो घट प्रेम न संचारे, जो घट जान सामान।
- जैसे खाल लुहार की, सांस लेत बिनु प्राण॥
- ज्यों तिल माहि तेल है, ज्यों चकमक में आग।
- तेरा साईं तुझ ही में है, जाग सके तो जाग॥
- तन को जोगी सब करे, मन को विरला कोय।
- सहजे सब विधि पाइए, जो मन जोगी होए॥
- तीरथ गए से एक फल, संत मिले फल चार।
- सतगुरु मिले अनेक फल, कहे कबीर विचार॥
- ते दिन गए अकारथ ही, संगत भई न संग।
- प्रेम बिना पशु जीवन, भक्ति बिना भगवंत॥
- दुःख में सुमिरन सब करे, सुख में करे न कोय।
- जो सुख में सुमिरन करे, तो दुःख काहे को होय॥
- नहाये धोये क्या हुआ, जो मन मैल न जाए।
- मीन सदा जल में रहे, धोये बास न जाए॥
- निंदक नियेरे राखिये, आँगन कुटी छावायें।
- बिन पानी साबुन बिना, निर्मल करे सुहाए॥
- पानी केरा बुदबुदा, अस मानस की जात।
- देखत ही छुप जाएगा है, ज्यों सारा परभात॥
- पाहन पूजे हरि मिलें, तो मैं पूजौं पहार।
- याते ये चक्की भली, पीस खाय संसार॥
- प्रेम न बारी उपजे, प्रेम न हाट बिकाए।
- राजा प्रजा जो ही रुचे, सिस दे ही ले जाए॥
- बड़ा भया तो क्या भया, जैसे पेड़ खजूर।
- पंथी को छाया नहीं फल लागे अति दूर॥
- बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय।
- जो मन देखा आपना, मुझ से बुरा न कोय॥
- मलिन आवत देख के, कलियन कहे पुकार।
- फूले फूले चुन लिए, कलि हमारी बार॥
- माटी कहे कुमार से, तू क्या रोंदे मोहे।
- एक दिन ऐसा आएगा, मैं रोंदुंगी तोहे॥
- मैं-मैं बड़ी बलाइ है, सकै तो निकसो भाजि।
- कब लग राखौ हे सखी, रूई लपेटी आगि॥
- यह तन विष की बेलरी, गुरु अमृत की खान।
- शीश दियो जो गुरु मिले, तो भी सस्ता जान॥
- राम बुलावा भेजिया, दिया कबीरा रोय।
- जो सुख साधू संग में, सो बैकुंठ न होय॥
- सब धरती काजग करू, लेखनी सब वनराज।
- सात समुद्र की मसि करूँ, गुरु गुण लिखा न जाए॥
- साधु ऐसा चाहिए जैसा सूप सुभाय।
- सार-सार को गहि रहै थोथा देई उडाय॥
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